Saturday, June 24, 2017

द्रौपदी और पाण्डवों का विवाह

*पाण्डव एवं द्रोपदी का विवाह वर्णन*

*कुन्ती का आशीर्वाद*

क्रमशः युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ द्रौपदी का पाणिग्रहण हुआ । इस स्थान पर देवर्षि नारद ने कहा है कि द्रौपदी में कुछ ऐसी अभ्दुत बात थी कि वह प्रत्येक पाण्डव के साथ विवाह करने के समय कन्या-भाव को प्राप्त हो जाया करती थी । 
*विवाह होने के साथ ही द्रुपद ने इतना दहेज दिया कि पाण्डवों को किसी वस्तु की कमी नहीं रह गयी । 

सैकड़ों रथ, घोड़े, हाथी, दास, दासी, हीरे, जवाहरात, रत्न, वस्त्र और आभुषणों से पाण्डवों को अपने समान राजा ही बना दिया ।*भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े प्रेम और प्रसन्नता से पाण्डवों के विवाह में सहयोग दिया । वे उनके प्रत्येक कृत्य में उपस्थित रहे और सलाह देते रहे । उन्होंने सगुन के तौर पर वैदूर्य मणि से जटित बहुमुल्य आभूषण, कीमती कपड़े, देश-विदेश के चित्र+विचित्र कम्बल और दुशाले, सैकड़ों दासियाँ, शान्त और नम्र अनेकों हाथी, गहनों से सजे हुए उतम घोड़े, सुर्वण मण्डित सैकड़ों रथ, करोङ़ो मोहरें और छकङ़ो सोना उपहार में दिया । धर्मराज युधिष्ठिर ने आवश्यकता और इच्छा न होनेपर भी श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये सब स्वीकार कर लिया । 

पाण्डवों से सम्बन्ध हो जाने के कारण द्रुपद का बल और भी बढ़ गया, वे निर्भय हो गये । द्रोपदी अपनी सास कुन्ती के पास ही रहती, रानियाँ कुन्ती के पास आती और अपना नाम बतलाकर प्रणाम करती । द्रौपदी अनेक दासियो के रहने पर भी अपनी सास की सेवा अपने हाथों करती । द्रौपदी की सुशीलता, सदाचार मर्यादा और सभ्यता पर कुन्ती मुग्ध थी । वे आद्र-हृदय से द्रौपदी को आशीर्वाद देती । वे कहती --वेटी  ! तुम सब गुणों से भरी-पूरी हो, तुम्हें कोई क्या शिक्षा देगा ? फिर भी वात्सल्य स्नेह कुछ-न-कुछ कहला ही देता है । 
*इन्द्राणी इन्द्र से, स्वाह अग्नि से, रोहणी चंद्र से, दमयन्ती नल से, भद्रा कुबेर से, अरून्धती वसिष्ठ से और लक्ष्मी नारायण से जैसा व्यवहार करती है, वैसा ही तुम भी अपने पतियों से करो । कल्याणी  !* मैं हृदय से आशीर्वाद देती हूँ कि तुम चिरजीवनी, वीर-प्रसविनी  बहुत बन्धु+बान्धवों वाली, सौभाग्यशाली और पतिव्रता होकर सब प्रकार के सुख भोगों । अतिथि -अभ्यागत, साधु, बूढ़े और बालकों की आवभगत और पालन-पोषण करने में ही तुम्हारा समय बीते । तुम्हारे स्वामी राजा हो और रानी के पदपर तुम्हारा अभिषेक हो । तुम्हारे पति अपने बाहुबल से सारी पृथ्वी को जीत ले और तुम वह पृथ्वी अश्वमेघ महाय़ज्ञ की दक्षिणा में दान करो । पृथ्वी के सब श्रेष्ठ पदार्थ सौ वर्ष तक तुम्हें प्राप्त होते रहें और तुम उनका उपयोग करती रहो । आज मैं जिस प्रकार तुम्हारा अभिनंदन करती हूँ, वैसे ही पुत्र प्राप्त होनेपर भी करूँ । द्रौपदी बड़े प्रेम से उनके चरणों का स्पर्श करती और आशीर्वाद ग्रहण करती । द्रोपदी के दिन बङे सुख से बीतने लगे, वह सब प्रकार से सुखी थी । हाँ, उसके मन में यह बात कभी-कभी आ जाया करती थी की यदि मैं अपने पतियों के राज्य में होती तो कितना अच्छा होता ।।

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