Wednesday, August 16, 2017

*जब भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को फटकारा*

*जब भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को फटकारा*

महाभारत युद्ध का आखिरी दिन था। दुर्योधन कुरुक्षेत्र स्थित तालाब में जाकर छुप गया। सारी कौरव सेना समाप्त हो चुकी थी। दुर्योधन के अलावा कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा ही कौरव सेना में शेष बचे थे। पांडव दुर्योधन को खोजते हुए उस तालाब के किनारे पहुंचे। तालाब में छिपे दुर्योधन से युधिष्ठिर ने बात की। दुर्योधन ने कहा कि तुम पांच भाई हो और मैं अकेला हूं। हममें युद्ध कैसे हो सकता है? तो युधिष्ठिर ने दुर्योधन से कहा कि हम पांचों तुम्हारे साथ नहीं लड़ेंगे। तुम हममें से किसी एक को युद्ध के लिए चुन लो। अगर तुमने उसे हरा दिया तो हम तुम्हें युद्ध में जीता मानकर राज्य तुम्हें सौंप देंगे।
युधिष्ठिर की बात सुन श्रीकृष्ण को क्रोध आ गया। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि तुमने ये क्या किया? इतने भीषण युद्ध के बाद हाथ आई जीत को हार में बदल लिया। ये युद्ध है, इसमें जुए का नियम मत लगाओ। अगर दुर्योधन ने नकुल, सहदेव में से किसी एक को युद्ध के लिए चुन लिया तो वे प्राणों से भी जाएंगे और हमारे हाथ से वो राज्य भी चला जाएगा।
लाइफ मैनेजमेंट- आपको किसी भी वादे को करने से पहले उस पर ठीक से विचार तो करना चाहिए। ऐसे बिना सोचे-समझे ही अपना सबकुछ दांव पर कैसे लगाया जा सकता है।

Tuesday, August 15, 2017

*जब अश्वत्थामा ने मांग लिया कृष्ण का सुदर्शन चक्र*

*जब अश्वत्थामा ने मांग लिया कृष्ण का सुदर्शन चक्र*

एक बार पांडव और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा द्वारिका पहुंच गया। भगवान कृष्ण ने उसका बहुत स्वागत किया और उसे अतिथि के रूप में अपने महल में ठहराया। कुछ दिन वहां रहने के बाद एक दिन अश्वत्थामा ने श्रीकृष्ण से कहा कि वो उसका अजेय ब्रह्मास्त्र लेकर उसे अपना सुदर्शन चक्र दे दें। भगवान ने कहा ठीक है, मेरे किसी भी अस्त्र में से जो तुम चाहो, वो उठा लो। मुझे तुमसे बदले में कुछ भी नहीं चाहिए। अश्वत्थामा ने भगवान के सुदर्शन चक्र को उठाने का प्रयास किया, लेकिन वो टस से मस नहीं हुआ।
उसने कई बार प्रयास किया, लेकिन हर बार उसे असफलता मिली। उसने हारकर भगवान से चक्र न लेने की बात कही। भगवान ने उसे समझाया कि अतिथि की अपनी सीमा होती है। उसे कभी वो चीजें नहीं मांगनी चाहिए जो उसके सामर्थ्य से बाहर हो। श्रीकृष्ण ने कहा कि ये चक्र मुझे अत्यंत प्रिय है। इसे 12 साल तक घोर तपस्या करने के बाद पाया है, उसे तुमने ऐसे ही मांग लिया। बिना किसी प्रयास के। अश्वत्थामा बहुत शर्मिंदा हुआ। वह बिना किसी शस्त्र-अस्त्र को लिए ही द्वारिका से चला गया।
लाइफ मैनेजमेंट- अपनी कोशिश के अनुपात में ही फल की आशा करना चाहिए। साथ ही, किसी से कुछ भी मांगते समय भी अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए।